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Editorial

जब मन परमपुरुष की ओर बढ़ता है, तब जीवन भी बदलता है

By SAT PATH · September 27, 2026 at 03:40 AM

“कीर्तनीयः सदा हरिः” — यह केवल भक्ति का एक वाक्य नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन को भीतर से बदलने वाली एक गहरी जीवन-दृष्टि है। प्रस्तुत विचार में कहा गया है कि मनुष्य के जीवन में मन अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिस दिशा में मन चलता है, सामान्यतः जीवन भी उसी दिशा में आगे बढ़ता है। इसलिए मन को सकारात्मक, शांत और परम सत्य की ओर उन्मुख करना आध्यात्मिक जीवन का मूल उद्देश्य माना गया है। आज का मनुष्य भौतिक सुविधाओं के बावजूद मानसिक अशांति, तनाव, प्रतिस्पर्धा और असंतोष से घिरा हुआ है। उसके पास समय बचाने वाले साधन तो बढ़े हैं, लेकिन स्वयं के साथ बैठने का समय कम होता जा रहा है। ऐसे समय में कीर्तन केवल धार्मिक अनुष्ठान न रहकर मन को केंद्रित करने और भीतर की बेचैनी को शांत करने का माध्यम बन सकता है। बाबा नाम केवलम , के कीर्तनमहिमा में व्यक्त विचार का केंद्रीय संदेश यही है कि जब एक व्यक्ति का मन परमपुरुष की ओर बढ़ता है और अनेक मनुष्य उसी भाव से जुड़ते हैं, तो सामूहिक चेतना में भी परिवर्तन आता है। इसे आध्यात्मिक दृष्टि से आनंद की अनुभूति कहा गया है। यही भाव आगे व्यक्ति के जीवन और समाज—दोनों के कल्याण से जुड़ता है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी है—क्या केवल कीर्तन करने से जीवन बदल जाएगा? शायद नहीं। कीर्तन तभी सार्थक है जब वह हमारे व्यवहार में दिखाई दे। यदि पूजा और कीर्तन के बाद भी मनुष्य के भीतर अहंकार, द्वेष, ईर्ष्या, छल और असहिष्णुता बनी रहे, तो आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। सच्ची भक्ति मनुष्य को अधिक संवेदनशील, संयमी और सहयोगी बनाने की दिशा में ले जानी चाहिए। कीर्तन का सामूहिक स्वर भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। इसमें व्यक्ति अकेला नहीं रहता। अनेक लोग एक ही भाव और एक ही लय में जुड़ते हैं। सामाजिक जीवन में भी यही भावना आवश्यक है—मैं से हम की ओर बढ़ना। परिवार, समाज और कार्यस्थल में यदि व्यक्ति केवल अपने हित के बजाय सामूहिक हित को महत्व देने लगे, तो अनेक संघर्ष स्वतः कम हो सकते हैं। आज जब समाज विभिन्न प्रकार के विभाजन और तनाव का सामना कर रहा है, आध्यात्मिकता का अर्थ संसार से पलायन नहीं, बल्कि अपने भीतर ऐसी चेतना विकसित करना होना चाहिए जिससे हम संसार में रहते हुए बेहतर मनुष्य बन सकें। भक्ति यदि मन को निर्मल करती है, तो उसका प्रभाव हमारे विचारों, शब्दों और कर्मों में भी दिखाई देना चाहिए। अंततः इस उद्धरण का संदेश यही है कि मन की दिशा ही जीवन की दिशा निर्धारित करती है। यदि मन निराशा, द्वेष और स्वार्थ में उलझा रहेगा तो बाहरी उपलब्धियां भी पूर्ण संतोष नहीं दे पाएंगी। लेकिन यदि मन में भक्ति, सकारात्मकता, अनुशासन और व्यापक कल्याण की भावना विकसित हो, तो व्यक्तिगत जीवन के साथ सामाजिक जीवन भी बेहतर हो सकता है। इसलिए “कीर्तनीयः सदा हरिः” को केवल उच्चारण करने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने का संदेश समझना चाहिए। मन को ऊंचा उठाना, जीवन को बेहतर बनाना और उस बेहतर जीवन का लाभ समाज तक पहुंचाना—शायद यही इस विचार की सबसे बड़ी सार्थकता है। — संपादकीय, (सत् पथ)